Open Access Open Access  Restricted Access Subscription Access

सृजनात्मक प्रवृत्ति के रूप में आंचलिकता का स्वरूप और महत्व

Sunita Kumari

Abstract


आंचलिकता की सामान्‍य समझ आज भी अनेक पूर्वाग्रहों से ग्रस्‍त है | आंचलिक शब्‍द के सामने आते ही सामान्‍यतः हम इसे किसी न किसी अंचल से संबंध्‍द मानते है |  ऐसा मानना गलत नहीं है, लेकिन यहॉं एक बडी गफलत की गुंजाश है जो अक्‍सर सामने आती है |  वह   गफलत यह है कि अंचल से इसकी संबध्‍दता को देश – काल के संबंधमें इसके सीमित होने का अनिवार्य प्रमाणक भी मान लिया जाता है

आंचलिकता के वास्‍तविक स्‍वरूप की पहचान मैला आंचल के प्रकाशन और उसकी अभूतपूर्व लोकप्रियता के कारण एक महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न बनकर सामने आयी |  तब से लेकर अबतक हिन्‍दी कथा – साहित्‍य की आलोचना के प्रसंग के अनेक महत्‍वपूर्णआलोचकों ने इस प्रश्‍नके उत्‍तर अपेन अपने ढंग से दिये है | आंचलिकता का हिंन्‍दी कथा –साहित्‍यमें प्रवेश महान संयोग नही बल्कि युग –धर्म की स्‍वाभाविक मॉंग है | यह स्‍वाधीन भारत के व्‍यष्टिमूलक सृजनात्‍मक  सांस्‍कृतिक संधान व्‍दारा स्‍वाधीनता की वास्‍तविक उपलब्धि का सहयोगी प्रयास है |


Keywords


सृजनात्म‍क प्रवृत्ति, आंचलिकता

Full Text:

PDF

Refbacks

  • There are currently no refbacks.


Copyright (c) 2017 Sunita Kumari