गीता के साथ उपनिषद् और दर्शन का सम्बन्ध

  • Rajesh Pramanik Department of Sanskrit, Banaras Hindu University,
Keywords: भगवतगीता, ईशोपनिषद, श्वेताश्वतेरोपनिषद, वृहदारण्यकोपनिषद, सांख्य-योग, बौद्धधर्म या दर्शन, मोक्ष

Abstract

आर्षकाव्य महाभारत के अन्तर्गत भगवतगीता तदनन्तरकाल से आजतक धर्मग्रन्थ के नाम से विशेष महत्त्वपूर्ण है। इसका सम्पूर्ण दार्शनिक दृष्टिभङ्गि उपनिषदों के आधार पर आधारित हैं। इसी दृष्टिपात से कहा जा सकता है की गीता, उपनिषद् और दर्शन वस्तुतः निष्काम एवं सकाम कर्मों के सहायता से इस जगत्-संसार के जन्म से सदा के लिए विदा पाने के मूलमन्त्र प्राचीनकाल से वर्तमान तक निबन्ध आकार से वह सब शास्त्रों में स्थापित हैं। गीता के अष्टादश अध्यायों में जिस तरह अच्यूत के उक्ति से गूढाकेश अर्जुन को संसार से मोह त्याग करने के लिए कहा है; उसी तरह वृहदारण्यक उपनिषद् के याज्ञवल्क-मैत्री संवाद में याज्ञवल्क कर्तृक सम्पत्ति की माया त्याग से परमात्मा का साक्षात्कार तथा सन्यास प्राप्ति की बातें बाताये है। यहा आध्यात्मिक दृष्टिपात के माध्यम से दार्शनिक दृष्टिपात परिलक्षित है। सांख्य-योगदर्शन के दार्शनिक तत्त्व भगवतगीता के दार्शनिक विचार के द्वारा विचार्य है। सांख्य में ईश्वर-तत्त्व नही है; लेकिन गीता पर ईश्वर स्थापना अत्यन्त आकृष्ट प्रतीत होता है। पुरूष एकतन्त्र तत्त्व नहीं, अपितु प्रकृति तथा ईश्वर का ही एक रुप है। सांख्यदर्शन के विषय के प्रति हमारा दृष्टिगोचर होने से समझा जा सकता है की, वहा किस प्रकार प्रकृति के समस्त अवस्थायों को एक प्रतीति के रूप में स्वीकार किया गया है; जो कि नित्यस्थायी विषयों के प्रति संकेत देता हैं, ऐसा उपलब्धमात्र का बोध होता है। चेतना रहित होने पर भी प्रकृति के कार्य को निष्प्रयोजन नहीं कहा जा सकता; और इस कार्य के प्रयोजन जीवात्मा के मोक्ष प्राप्त हेतु है। प्रकृतिरूप नाट्यभूमि में एक धार्मिक परब्रह्मसम्बन्धी तथ्य विद्यमान है। सांख्य में जैसे पुरूष और आत्मा एकतन्त्र यथार्थ सत्त्वा नहीं तथापि आनन्दस्वरूप है, क्योकि प्रकृति का स्वरूप केवल ज्ञानस्वरूप नहीं हो सकता। गीता पुरूषोत्तम तथा सर्वोपरि आत्मा की अस्तित्त्व में विश्वास करता है, लेकिन जीवात्मा के साथ परमात्मा को पृथक् भावना इसका आलोचित विषय नहीं। फिर भी जीवात्मा का स्वरूप तथा प्रकृति के साथ सम्बन्ध भगवतगीता का यह सम्पर्क सांख्यदर्शन प्रदत्त प्रकृति-पुरूष के प्रभाव को दरशाता है। मनुष्य तथा जगत्-संसार में जीवों के परलोकप्राप्ति इस विषय में प्रकृति के सात्विक, राजस, तामस से कोई पृथक् नहीं। यह एक त्रिगुणात्मक बन्धन है और इस बन्धन से छुटकारा पाने का नाम मोक्ष है। त्रिगुणात्मक गुणसमुहों को आभ्यन्तरिन अङ्ग और इन्द्रियसमुहों के भौतिक रचना का वर्णन गीता और सांख्य सदृश् उपलब्ध है। सांख्य के यौक्तिक प्रक्रिया का उल्लेख भी मिलता है। सुतरां स्पष्ट है, जैसे हमें गीता में आध्यात्मिकता और दार्शनिकता का सन्धान मिलता है; वैसे ही उपनिषद् और दर्शनशास्त्रों के अनेकांश में मिलता जुलता है। जैसे गीता, उपनिषद् और दर्शनशास्त्रों के विचारशक्ति के माध्यम से जीवों के जन्म-मृत्यु को बाधाप्राप्त करेक निजी दार्शनिक शक्ति की उद्बुद्ध से मोक्ष का पथ सुनिश्चित किया है; फिर भी उक्त भगवतगीता, उपनिषद्, दर्शनशास्त्र एक दुसरे के उपर निर्भरशील होने पर भी तिनोके भिन्न भिन्न नामानुसार ब्रह्म, परब्रह्म, परमात्मा ईश्वर तथा मोक्ष प्राप्ति की मूलमन्त्र एक है, इस विषय पर कोई भी सन्देह नहीं कर सकता।

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